दुनिया भर में दवाओं के बेअसर होने यानी ‘एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस’ (AMR) का खतरा गहराता जा रहा है। दशकों से एंटीबायोटिक दवाओं ने लाखों लोगों की जान बचाई है लेकिन अब ये दवाएं बेअसर हो रही हैं। बैक्टीरिया, वायरस, फंगस जैसे सूक्ष्मजीवों ने खुद को इस तरह विकसित कर लिया है कि वे मौजूदा दवाओं को बेअसर कर देते हैं। हाल ही में आई ‘2026 एएमआर बेंचमार्क’ रिपोर्ट के मुताबिक, अगर हालात नहीं सुधरे तो साल 2050 तक इस वजह से हर साल करीब 80 लाख लोगों की जान जा सकती है। फिलहाल, हर साल लगभग 10 लाख लोग सीधे तौर पर इन सुपरबग्स का शिकार हो रहे हैं।
हालिया शोध और एक्सपर्ट्स की चेतावनी के अनुसार, यदि इस ओर तुरंत कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो 2050 तक हर साल लाखों मौतें होंगी। बुजुर्गों और कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों के लिए यह खतरा सबसे अधिक है क्योंकि अस्पताल में मिलने वाले संक्रमण अब दवाओं से ठीक नहीं हो रहे हैं। रिपोर्ट बताती है कि हालांकि कंपनियां लड़ाई लड़ रही हैं लेकिन जिस रफ्तार से बीमारियां दवाओं को बेअसर कर रही हैं, उस मुकाबले नई दवाओं पर रिसर्च बहुत धीमी है।
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नई दवाओं की कमी और कुछ उम्मीदें
रिपोर्ट में सबसे बड़ी चिंता कमजोर पाइपलाइन को लेकर जताई गई है, जिसका मतलब है कि बाजार में नई एंटीबायोटिक दवाएं बहुत कम आ रही हैं। बड़ी कंपनियां अब इंफेक्शन की दवाओं पर रिसर्च करने से पीछे हट रही हैं, जिसकी वजह से अब छोटी कंपनियों पर जिम्मेदारी बढ़ गई है।
द लांसेट में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, 1990 से 2021 के बीच AMR की वजह से हर साल 10 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हुई है। आने वाले समय में यह आंकड़ा और भी डरावना होने वाला है। अनुमान है कि 2050 तक सुपरबग के कारण होने वाली कुल मौतों का आंकड़ा कई गुना तक पहुंच सकता है।
इस पूरे रिसर्च में एक अच्छी खबर यह है कि कुछ कंपनियों ने यूरिन इन्फेक्शन (UTI) के लिए करीब 30 साल बाद एक नई ओरल दवा तैयार की है। साथ ही, गोनोरिया जैसी बीमारी, जिस पर लगभग सभी दवाएं बेअसर हो चुकी थीं, उसके लिए भी नए विकल्प सामने आए हैं।
बच्चों के लिए दवाओं का संकट
रिपोर्ट एक और गंभीर समस्या की ओर इशारा करती है जिसमें कहा गया है कि बच्चों के लिए बेहतर दवाओं की कमी है। कम आय वाले देशों जैसे अफ्रीका के कई देश में बच्चों के हिसाब से बनी एंटीबायोटिक दवाएं उपलब्ध ही नहीं हैं। जब बच्चों को बड़ों वाली या अधूरी दवा दी जाती है, तो बैक्टीरिया और ज्यादा ताकतवर हो जाते हैं और दवाएं उन पर काम करना बंद कर देती हैं।
सुपरबग क्यों बन रहे हैं चुनौती?
दवाओं का दुरुपयोग: बिना डॉक्टर की सलाह के छोटी-मोटी बीमारियों (जैसे जुकाम-खांसी) में एंटीबायोटिक लेना।
कोर्स अधूरा छोड़ना: दवा का पूरा कोर्स न करने से बैक्टीरिया पूरी तरह खत्म नहीं होते और दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं।
पशुपालन में उपयोग: मांस उत्पादन बढ़ाने के लिए जानवरों को दी जाने वाली एंटीबायोटिक दवाएं भोजन के जरिए इंसानों तक पहुंच रही हैं।
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इसका क्या होगा असर?
अगर एंटीबायोटिक काम करना बंद कर दें, तो सिजेरियन डिलीवरी, हिप रिप्लेसमेंट, कैंसर की कीमोथेरेपी और ऑर्गन ट्रांसप्लांट जैसी सामान्य प्रक्रियाएं भी जानलेवा हो जाएंगी क्योंकि संक्रमण को रोकने का कोई तरीका नहीं बचेगा।
आगे की राह
विश्लेषण से पता चला है कि 2021 के मुकाबले फार्मा इंडस्ट्री का प्रदर्शन इस क्षेत्र में थोड़ा गिरा है। रिपोर्ट का साफ कहना है कि कोई भी कंपनी या सरकार अकेले इस ‘सुपरबग’ से नहीं लड़ सकती। इसके लिए सरकारों को भी निवेश बढ़ाना होगा और कंपनियों को मुनाफे से हटकर दुनिया को बचाने के लिए नई दवाओं और उनकी सप्लाई पर ध्यान देना होगा।
