राष्ट्रपति और राज्यपाल को समय सीमा में बाँधना संविधान के विरुद्ध: केंद्र

नई दिल्ली: राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए विधेयकों पर फैसला लेने की समय सीमा तय करने के मामले में राष्ट्रपति की ओर से सुप्रीम कोर्ट को भेजे गए प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर केन्द्र सरकार ने जवाब दाखिल कर दिया है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जवाब में कहा है कि न्यायपालिका द्वारा समयसीमा निर्धारित करना संविधान के विरुद्ध होगा। केन्द्र ने कहा है ऐसा करने से संवैधानिक अव्यवस्था पैदा होगी जो संविधान निर्माताओं की परिकल्पना के विरुद्ध होगा।

केन्द्र ने कहा है जब शक्तियों के प्रयोग को लचीला बनाए रखना हो तो संविधान कोई निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं करता है। क्योंकि अनुच्छेद 200 या 201 कोई विशिष्ट समय-सीमा निर्धारित नहीं करते। संविधान ने जानबूझकर इस प्रक्रिया के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की है, ताकि राज्यपाल आवश्यकतानुसार राजनीतिक व संवैधानिक परिस्थितियों के अनुसार विवेक का प्रयोग कर सकें।

जवाब में ये भी कहा गया है कि अगर इसमें समय सीमा जोड़ा जाता है, तो यह संविधान निर्माताओं की मंशा को ठुकराने के समान होगा। साथ ही जवाब में स्पष्ट किया गया है कि अनुच्छेद 142 कोई ऐसी न्यायिक शक्ति नहीं है जो संवैधानिक प्रावधानों को दरकिनार कर सके, और सर्वोच्च न्यायालय भी संवैधानिक प्रावधानों और सिद्धांतों से बंधा हुआ है।

साथ ही केन्द्र ने कहा है कि संविधान के किसी एक अंग की कथित विफलता किसी दूसरे अंग को ऐसी शक्तियाँ ग्रहण करने का अधिकार नहीं देती जो संविधान ने उसे नहीं दी है और अगर इस की अनुमति दी जाती है, तो इसका परिणाम एक संवैधानिक अव्यवस्था होगी जिसकी परिकल्पना संविधान निर्माताओं ने नहीं की थी।

आपको बता दें तमिलनाडु सरकार ने राज्यपाल द्वारा कई विधेयकों को लम्बे समय तक विचाराधीन रखने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी जिस पर जस्टिस पारदीवाला की बेंच ने फैसला सुनाते हुए राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए विधेयकों पर निर्णय की अधिकतम समयसीमा तय कर दी थी।

 

 

 

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