बॉम्बे हाईकोर्ट की सरकार और पुलिस पर सख्त टिप्पणी, विरोध करना नागरिकों का अधिकार: जस्टिस माधव जामदार

देश : बॉम्बे हाईकोर्ट में गुरुवार को एक अहम सुनवाई के दौरान जस्टिस माधव जामदार ने सरकार और पुलिस की कार्रवाई पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी नागरिक को केवल इसलिए शहर या इलाके से बाहर नहीं किया जा सकता क्योंकि उसने सरकार के फैसलों का विरोध किया या सरकार के खिलाफ नारे लगाए। अदालत ने साफ कहा कि लोकतंत्र में विरोध करना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और इसे अपराध की तरह नहीं देखा जा सकता। जस्टिस जामदार ने सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि अगर कोई व्यक्ति “सरकार मुर्दाबाद” या किसी नेता के खिलाफ नारे लगाता है तो उसे देश निकाला देने का आधार कैसे बनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है जैसे लोगों को सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है, जबकि पुलिस प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की निजी नौकर नहीं बल्कि कानून की सेवक है।

यह मामला सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया यानी SDPI के महासचिव सईद अहमद से जुड़ा है। मुंबई पुलिस ने उनके खिलाफ एक साल का देश निकाला आदेश जारी किया था, जिसे चुनौती देते हुए उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सईद अहमद नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद सहित कई मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन आयोजित कर चुके हैं। पुलिस ने उनके खिलाफ दर्ज पांच एफआईआर के आधार पर यह कार्रवाई की थी। अदालत ने पाया कि अधिकांश मामले शांतिपूर्ण प्रदर्शन और सरकार के फैसलों के विरोध से जुड़े थे।

सुनवाई के दौरान जस्टिस माधव जामदार ने कहा कि संविधान हर नागरिक को अपनी बात कहने और सम्मान के साथ जीने का अधिकार देता है। केवल विरोध प्रदर्शन करना किसी व्यक्ति को शहर से बाहर निकालने का कानूनी आधार नहीं बन सकता। इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने सईद अहमद के खिलाफ जारी एक साल के देश निकाला आदेश को रद्द कर दिया और पुलिस व प्रशासन के आदेश भी निरस्त कर दिए।

सुनवाई के दौरान जस्टिस जामदार ने महाराष्ट्र की राजनीति पर भी टिप्पणी करते हुए कथित हॉर्स ट्रेडिंग का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि राज्य में राजनीतिक दल बदल की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं और व्यंग्यात्मक अंदाज में सईद अहमद से भी “साइड बदलने” की बात कही। अदालत की इन टिप्पणियों ने न्यायपालिका, नागरिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

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