इटावा की एक मजार इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। वजह है वहां हुई बुलडोजर कार्रवाई, जिसने कुछ ही घंटों में पूरे इलाके की तस्वीर बदल दी। बताया जा रहा है कि बुधवार शाम वन विभाग की टीम भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंची और फिर रातभर चली कार्रवाई में ‘बीहड़ वाले सैयद बाबा’ के नाम से मशहूर मजार को जमींदोज कर दिया।
हालांकि, जिस जमीन पर यह मजार स्थित थी, उसे पूरी तरह समतल कर दिया गया और बाद में वहां पौधे भी लगा दिए गए। हालात ऐसे थे कि पहली नजर में यह समझ पाना मुश्किल था कि यहां कभी कोई धार्मिक स्थल मौजूद था, क्योंकि मजार का नामो-निशान तक नहीं बचा था।

पूरा मामला क्या है, आइए जानते हैं
3000 स्क्वायर फीट में बनी यह मजार इटावा से डेढ़ किलोमीटर दूर बीहड़ के फिशर वन क्षेत्र में स्थित थी। मजार ‘बीहड़ वाले सैयद बाबा’ के नाम से प्रसिद्ध थी। 3 जनवरी, 2026 को हिंदू संगठनों ने सीएम पोर्टल पर शिकायत की थी कि यह मजार अवैध है। 5 जनवरी को डीएम कार्यालय को आदेश मिला कि मजार की जमीन की जांच कर रिपोर्ट पेश की जाए। इसके बाद वन विभाग ने जांच शुरू की। जांच में वन रेंज अधिकारी ने पाया कि यह जमीन वन विभाग के नाम दर्ज है और वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत केंद्र सरकार की अनुमति के बिना इस जमीन पर कोई गैर-वन कार्य नहीं किया जा सकता। 5 फरवरी को पहली सुनवाई हुई, मजार पक्ष ने जवाब देने के लिए समय मांगा, लेकिन 16 फरवरी तक जवाब दाखिल नहीं किया। इसके बाद उन्हें 20 फरवरी और फिर 23 मार्च तक की मोहलत दी गई – 28 मार्च को अंतिम मौका दिया गया, लेकिन मजार से जुड़े जरूरी दस्तावेज पक्षकार पेश नहीं कर सके। इस पर कोर्ट ने आदेश दिया कि भूमि पर उनका कोई वैध अधिकार नहीं है और मजार हटाई जाए। मजार के केयरटेकर ने कानपुर स्थित वन संरक्षक के समक्ष अपील दाखिल की, लेकिन उनकी अपील खारिज हो गई।
मजार के केयरटेकर का दावा है कि मजार 800 साल पुरानी थी। कुछ लोग इसे मोहम्मद गोरी के सेनापति शमसुद्दीन की मजार बताते हैं, लेकिन यह दावा पूरी तरह गलत और निराधार है। वन विभाग का कहना है कि मजार सरकारी जमीन पर बनी हुई थी, इसलिए कार्रवाई की गई। यह मजार कब बनी, किसने बनाई और इसकी स्थापना कब हुई, इसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। वन विभाग के अधिकारियों के पास भी इसके निर्माण से जुड़ा कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है।
