चैत्र नवरात्रि प्रथम दिन: माँ शैलपुत्री का आगमन और ‘विक्रम संवत 2083’ का शंखनाद

Delhi: आज से चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व शुरू हो रहा है। चारों ओर भक्ति का वातावरण है और प्रकृति भी पल्लवित होकर नए साल का स्वागत कर रही है। यह केवल व्रत-उपवास का समय नहीं है, बल्कि अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा को पुनर्जीवित करने का अवसर है।

1. माँ शैलपुत्री: अडिग विश्वास और शक्ति का प्रतीक

नवरात्रि के पहले दिन हम माँ शैलपुत्री की पूजा करते हैं। ‘शैल’ का अर्थ है पर्वत और ‘पुत्री’ का अर्थ है बेटी। हिमालय की पुत्री होने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है।

• स्वरूप: इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प है। माँ वृषभ (बैल) पर सवार रहती हैं।

• महत्व: माँ शैलपुत्री मूलाधार चक्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। इनकी पूजा करने से व्यक्ति के भीतर स्थिरता, धैर्य और संकल्प शक्ति आती है। जिस तरह पर्वत अडिग रहता है, वैसे ही माँ हमें जीवन की चुनौतियों में स्थिर रहना सिखाती हैं।

2. हिंदू नव वर्ष: ‘विक्रम संवत 2083’ का प्रारंभ

आज के दिन ही चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से हिंदू नव वर्ष की शुरुआत हो रही है। इस वर्ष हम ‘विक्रम संवत 2083’ में प्रवेश कर रहे हैं।

• ऐतिहासिक गौरव: महाराजा विक्रमादित्य ने शकों पर विजय प्राप्त करने की स्मृति में इस संवत की शुरुआत की थी। यह गणना अत्यंत वैज्ञानिक है और खगोलीय पिंडों की गति पर आधारित है।

• सृष्टि का आरंभ: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्मा जी ने इसी तिथि को सृष्टि की रचना की थी, जिससे काल की गणना प्रारंभ हुई।

3. ऋतु परिवर्तन और वैज्ञानिक आधार

हिंदू नव वर्ष केवल एक तारीख नहीं, बल्कि प्रकृति का उत्सव है।

• पतझड़ के बाद पेड़ों पर नई कोपलें और वसंत की खुशबू इस नव वर्ष का स्वागत करती है।

• वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह समय ऋतु परिवर्तन का है, जब शरीर और मन के शुद्धिकरण (Detox) के लिए नौ दिनों का व्रत अत्यंत लाभकारी माना गया है।

4. घटस्थापना: ब्रह्मांडीय ऊर्जा का आह्वान

नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना का विशेष महत्व है। कलश को ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है, जिसमें समस्त तीर्थों और शक्तियों का वास होता है। मिट्टी के पात्र में ‘जौ’ बोना सुख-समृद्धि की वृद्धि का सूचक है।

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