यूपी में नदियों का रौद्र रूप, 26 जिले बाढ़ की चपेट में; 4 लाख आबादी प्रभावित, 60 जिलों में बारिश का अलर्ट

उत्तर प्रदेश में मानसूनी बारिश ने एक बार फिर हालात बिगाड़ दिए हैं। प्रदेश की कई प्रमुख नदियां उफान पर हैं और 26 जिले बाढ़ की चपेट में हैं। करीब 4 लाख की आबादी प्रभावित बताई जा रही है। कई इलाकों में बाढ़ से ज्यादा अब नदी के तेज कटान ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। कहीं मकान और पेड़ नदी में समा रहे हैं, तो कहीं सड़कें और पुल पानी में डूब गए हैं।

लखनऊ से सटे बाराबंकी में सरयू-घाघरा नदी का कटान बेहद तेज है। यहां नदी किनारे बनी एक मस्जिद का हिस्सा पिछले दो दिनों से नदी के ऊपर लटका हुआ है। आसपास के ग्रामीणों के सामने अपने घर और जमीन बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है। कई मकान नदी में समा चुके हैं और कुछ ग्रामीण अपने आशियाने खुद तोड़कर ईंट, दरवाजे और सामान सुरक्षित स्थानों पर ले जा रहे हैं।

पीलीभीत में शारदा नदी के तेज कटान से नदी किनारे बने मकान और बड़े-बड़े पेड़ पानी में समा गए। वहीं बुलंदशहर में गंगा की तेज धार में एक पक्का श्मशान घाट कुछ ही सेकंड में नदी में खिसक गया। बरेली में भी रामगंगा के कटान की वजह से नदी किनारे बना प्राचीन मंदिर धारा में समा चुका है।

कानपुर और उन्नाव में गंगा का जलस्तर खतरे के निशान के करीब है। नदी किनारे बसे गांवों में कई जगह 10 फीट तक पानी भर गया है। फर्रुखाबाद में गंगा और रामगंगा की दोहरी मार से करीब 60 गांव प्रभावित हैं। बदायूं में गंगा का पानी पुल के ऊपर तक पहुंच गया है।

प्रयागराज में गंगा-यमुना का जलस्तर फिर बढ़ रहा है और संगम के प्रमुख घाट जलमग्न हैं। वाराणसी में भी घाटों के ऊपर पानी बह रहा है। मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर छतों पर अंतिम संस्कार किए जा रहे हैं।

इधर मौसम विभाग ने शनिवार को प्रदेश के 60 से ज्यादा जिलों में गरज-चमक के साथ बारिश का अलर्ट जारी किया है। हालांकि मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक मानसून अब अंतिम चरण में है और अगले कुछ दिनों में बारिश की गतिविधियों में कमी आ सकती है।

लखनऊ में भी गोमती नदी की बाढ़ से कई गांव प्रभावित हैं। खेतों में धान और गन्ने की फसलें डूब गई हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को फील्ड में उतरकर खराब सड़कों की तत्काल मरम्मत और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत-बचाव कार्य तेज करने के निर्देश दिए हैं।

फिलहाल प्रशासन की सबसे बड़ी चुनौती नदी के बढ़ते जलस्तर के साथ-साथ कटान से प्रभावित परिवारों को सुरक्षित निकालना और संपत्ति के नुकसान को कम करना है।

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