क्या सोनम वांगचुक का अनशन एक राजनीतिक स्क्रिप्ट है?

देश: दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बना हुआ है। बाहर से इसे छात्रों और शिक्षा सुधार की लड़ाई बताया जा रहा है, लेकिन मंच पर दिखाई दे रही तस्वीरें और वहां से दिए जा रहे बयान एक बिल्कुल अलग कहानी कहते नज़र आ रहे हैं। सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में एक सामाजिक आंदोलन है, या फिर सरकार के खिलाफ एक सुनियोजित राजनीतिक अभियान?

सोनम वांगचुक खुद को एक सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं। उनके समर्थक भी दावा करते हैं कि उनका आंदोलन पूरी तरह गैर-राजनीतिक है। लेकिन यदि यह आंदोलन गैर-राजनीतिक है, तो फिर विपक्षी दलों के नेताओं की लगातार मौजूदगी क्यों दिखाई दे रही है? सरकार पर सीधे राजनीतिक हमले क्यों हो रहे हैं? और मंच से ऐसे बयान क्यों दिए जा रहे हैं, जिनका शिक्षा सुधार से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं दिखाई देता?

यही सबसे बड़ा सवाल है। लोकतंत्र में विरोध करने का अधिकार सबको है, लेकिन जनता को यह भी जानने का अधिकार है कि विरोध किस उद्देश्य से किया जा रहा है। यदि कोई संगठन खुद को गैर-राजनीतिक बताकर राजनीतिक एजेंडा चलाए, तो स्वाभाविक रूप से उसकी मंशा पर सवाल उठेंगे।

सोशल मीडिया पर आंदोलन से जुड़े कई वीडियो और बयान भी चर्चा का विषय बने हुए हैं। कुछ वीडियो में धार्मिक संतों और प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों को लेकर विवादित टिप्पणियां किए जाने के आरोप लगाए गए हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन यदि ऐसे बयान वास्तव में आंदोलन से जुड़े लोगों द्वारा दिए गए हैं, तो यह आंदोलन की गंभीरता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। क्या किसी सामाजिक आंदोलन का उद्देश्य समाज को जोड़ना होना चाहिए या नए विवाद खड़े करना?

दूसरी ओर केंद्र सरकार लगातार कह रही है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार, परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी बनाने और युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए लगातार कदम उठाए जा रहे हैं। यदि किसी विषय पर सुझाव हैं, तो संवाद के लोकतांत्रिक मंच मौजूद हैं। संसद है, न्यायपालिका है, विशेषज्ञ समितियां हैं। फिर हर मुद्दे का समाधान केवल सड़क और अनशन को ही क्यों बनाया जा रहा है?

सबसे बड़ा प्रश्न यह भी है कि यदि यह केवल छात्रों का आंदोलन है, तो इसका राजनीतिक लाभ आखिर किसे मिलता दिखाई दे रहा है? मंच पर कौन लोग सबसे अधिक सक्रिय हैं? कौन इसे सरकार के खिलाफ माहौल बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है? और कौन इस आंदोलन को चुनावी विमर्श में बदलने की कोशिश कर रहा है? इन सवालों का जवाब देश की जनता भी जानना चाहती है।

इतिहास गवाह है कि भारत में कई बड़े जनआंदोलन हुए, लेकिन जब भी किसी आंदोलन पर राजनीतिक दलों का प्रभाव बढ़ा, उसका मूल उद्देश्य पीछे छूट गया और राजनीति आगे आ गई। इसलिए आज सोनम वांगचुक के अनशन को लेकर भी यही सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह वास्तव में शिक्षा सुधार का आंदोलन है या सरकार के खिलाफ एक नया राजनीतिक मंच तैयार किया जा रहा है?

लोकतंत्र में विरोध का सम्मान होना चाहिए, लेकिन पारदर्शिता भी उतनी ही आवश्यक है। यदि आंदोलन गैर-राजनीतिक है, तो उसे गैर-राजनीतिक ही दिखाई भी देना चाहिए। लेकिन यदि मंच पर राजनीति होगी, राजनीतिक भाषण होंगे और विपक्षी दलों की सक्रिय भूमिका होगी, तो जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि कहीं यह अनशन सामाजिक कम और राजनीतिक अधिक तो नहीं?

आखिरकार लोकतंत्र में निर्णय भावनाओं से नहीं, तथ्यों और पारदर्शिता से होते हैं। इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह देशहित का आंदोलन है, या फिर सरकार को घेरने के लिए तैयार की गई एक नई राजनीतिक पटकथा?

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