लखनऊ: मलिहाबाद तहसील अंतर्गत कसमंडी कला गांव में 11वीं शताब्दी के राजा कंसा पासी के किले को लेकर हिंदू और मुस्लिम पक्ष में तीखा विवाद छिड़ा हुआ है। पासी समाज और हिंदू संगठन (हिंदू महासभा, लाखन आर्मी, सुहेलदेव आर्मी) दावा करते हैं कि यह परिसर महाराजा कंसा पासी (नागवंशी शासक) का प्राचीन किला है, जिसमें शिव मंदिर था। मुस्लिम पक्ष इसे सदियों पुरानी मस्जिद-मजार और कब्रिस्तान बताता है, जहां लंबे समय से नमाज पढ़ी जा रही है।
पासी समाज का कहना है कि किले की दीवारें लखौरी ईंटों और चूने से बनी हैं। अंदर नाग, फूल, कलश जैसी हिंदू/नागवंशी आकृतियां बनी हुई हैं। हाल में लगाई गई सीमेंट की तख्ती और मजार को उन्होंने “अवैध कब्जा” बताया। मौलाना जमील अहमद उर्फ जॉनी के आने के बाद (करीब 4 साल पहले) नमाज और मदरसा शुरू हुआ। 21 मई को सूरज पासी के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ। हिंदू संगठनों ने सुंदरकांड, हनुमान चालीसा पाठ और आरती करने की कोशिश की। मांग है- पुरातत्व विभाग से जांच, मंदिर बहाली और मौलाना पर कार्रवाई।
वही स्थानीय मुस्लिमों का कहना है कि यह जगह राजस्व रिकॉर्ड में कब्रिस्तान और मस्जिद के रूप में दर्ज है (1933 फसली बंदोबस्त सहित पुराने दस्तावेज)। यहां 850 साल से मजार और 250 साल से मस्जिद का दावा किया जा रहा है। पहले कम लोग आते थे, लेकिन विवाद बढ़ने पर संख्या बढ़ी। उन्होंने कहा कि इलाका शांतिप्रिय है और विवाद नया है।
प्रशासनिक कार्रवाई: बढ़ते तनाव और बकरीद को देखते हुए जिला प्रशासन ने विवादित स्थल पर नमाज और पूजा-पाठ दोनों पर रोक लगा दी है। भारी पुलिस बल (PAC कंपनी) तैनात है, रास्ते सील हैं। CCTV निगरानी चल रही है। दोनों पक्षों को जांच का आश्वासन दिया गया।
विवाद की जड़ पिछले साल पूर्व डिप्टी CM दिनेश शर्मा के कंसा पासी महोत्सव वाले बयान और पासी समाज की ऐतिहासिक पहचान की मुहिम से जुड़ी मानी जा रही है। कसमंडी कला मुख्यतः हिंदू बाहुल्य है, जहां 2 साल पहले तक बड़े स्तर पर नमाज नहीं होती थी। यह विवाद भारत में कई जगहों पर चल रहे मंदिर-मस्जिद दावों की कड़ी है। फिलहाल शांति बनी हुई है, लेकिन दोनों पक्ष पुरातत्व सर्वे और कानूनी जांच की मांग कर रहे हैं। प्रशासन की सतर्कता से बकरीद पर कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। अंतिम फैसला पुरातत्व साक्ष्य, राजस्व रिकॉर्ड और अदालत पर निर्भर करेगा।
